इंसानी आंखों के साथ खिलवाड़

-प्रमोद कुमार/ आज भी हमारे देश में आंखों के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है और ऐसे मामले बढ़ते ही जा रहे हैं। शायद ही कोई ऐसा साल बीतता हो जब आंखों के
इलाज के नाम पर हुए ऑपरेशन के बिगडऩे और दृष्टि खोने की खबर न आए। फिलहाल सबसे ताजा एक और मामला महाराष्ट्र के बीड। जिले से सामने आया है, जहां ऑपरेशन के बाद पांच लोगों की आंखें खतरे में हैं। उन्हें बेहतर इलाज के लिए मुंबई पहुंचाया गया है। यदि पुराने सभी मामलों को मिलाकर देखा जाए तो बीड़ की स्थिति भी बिहार, राजस्थान, पंजाब या उत्तर प्रदेश के मामलों से कहीं भिन्न नहीं दिखाई देगी। इसका सीधा मतलब यही निकाला जा सकता है कि गरीब लोगों को आंख ठीक करने का आश्वासन देकर उनकी नेत्रदृष्टि से खेलना चिकित्सा जगत के एक वर्ग का स्थायी भाव हो गया है। सभी मामलों को मिलाकर तय किया जाए तो यह साफ दिखाई देगा कि समाज सेवा, नि:स्वार्थ सेवा और सरकारी सेवा के नाम पर लोगों के साथ धोखा हो रहा है। अक्सर मानवीयता के नाम पर जर्जर मशीनरी के दम पर सैकड़ों लोगों की आंखों को ठीक करने का दावा किया जाता है। संसाधनों के अभाव में कहीं भी ऑपरेशन टेबल यूं सज जाती है, जैसे गरीबों के लिए उससे बेहतर कोई और स्थान हो नहींसकता है। कागजोंपर दिखता भी वही है। मगर असल में कुछ सरकारी और सामाजिक कार्य की खानापूर्ति मेंजरूरतमंद लोगोंकी नजरें दांव पर लगती हैं और कुछ की खराब हो जाती हैं। मजेदार बात तो यह भी है कि इस किस्म के मामले से किसी भी राज्य के अछूते न रहने के बावजूद सरकारी स्तर पर अपना दामन बचाने के अलावा कोई गंभीरता नहीं दिखाई देती है। वर्ना किसी व्यक्ति की आंखों की रोशनी खत्म करना एक आपराधिक कृत्य ही है। उसे चिकित्सा की भाषा में समझा कर टाला नहीं जा सकता है, न ही सुधार के ढकोसलों को दिखाकर अपने दामन को बचाया जा सकता है। बचाव के नाम पर यह भी कहा जा सकता है कि भारत में चिकित्सा के क्षेत्र मेंसंसाधनों का अभाव है।
अच्छी चिकित्सा महंगी है और सुलभ नहीं है। मगर किसी व्यक्ति की धुंधली नजर को भी खत्म करना किस कीमत पर स्वीकार किया जा सकता है? यूं तो हर राज्य और केंद्र सरकार अनेक स्तर पर विकास का दावा करती है। अनेक मामलोंमें दुनिया से आगे निकलने की बात भी होती है किंतु देश के अनेक भागोंमेंआज भी आंख के सामान्य ऑपरेशन से लोगों को दृष्टि गंवानी पड।ती है। सही तौर देखा जाए तो यह स्थिति विकास की उजली तस्वीरों से मेल नहीं खाती है। अब वक्त की नजाकत को समझते हुए और लगातार कटु अनुभवों के बाद देश के स्वास्थ्य विभाग को बिगडे। मामलों को लेकर सचेत होना चाहिए। इलाज में बरती गई लापरवाही में कड।ी कार्रवाई के लिए जिम्मेदारी सुनिश्चित करनी चाहिए। तभी उसे केवल स्वास्थ्य ही नहीं बल्कि चिकित्सा के लिएभी चिंतित माना जाएगा। वरना बीड। के बाद देश का कोई और स्थान नजर आएगा, जहां बेपरवाह इलाज के आगे मजबूर इंसान नजर आएगा। अविश्वसनीय सरकारी तंत्र लोगों को मनमानी निजी सेवाओं को अपनाने के लिए विवश करता जाएगा, अगर यही हालात रहे तो आगे देश को बहुत कुछ खोना पड़ सकता है।

-प्रमोद कुमार
500/2 प्यारे लाल बिल्डिंग, नजदीक राजकीय महिला महाविद्यालय, मेहरौली रोड़, गुडग़ांव-122001, हरियाणा, मोबाइल- 9716415034

Post a Comment

Previous Post Next Post