प्रकृति विरुद्ध कार्यों को जन्म देतीं है मानसिक विकृतियां

सामाजिक जीवन की व्यवस्थायें चन्द लोगों के हाथ में होती हैं। ज्यादा सशक्त होने पर उनकी इच्छा के अनुरूप कानून का निर्माण होने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है तो छुटभइया नेताओं और उनके संरक्षकों की दम पर कानून की धज्जियां उडाई जाती हैं। सब कुछ आंखों के सामने घटित होता रहता है और उत्तरदायी लोग किन्हीं खास कारणों से गंधारी बनने को बाध्य हो जाते हैं। मानवीयता के समग्र से लेकर राष्ट, समाज, परिवार तक पहुंचने वाला क्रम स्वयं पर समाप्त हो जाता है। 
वर्तमान में सब कुछ भूलकर स्वयं पर केन्द्रित होने का फैशन चल निकला है। अधिकांश लोग अपने मां-बाप की परवाह किये बिना, व्यक्तिगत हितों पर ही केन्द्रित होकर रह गये है ऐसे में उनसे परिवार, समाज, राष्ट्र और विश्व के कल्याण हेतु अपेक्षायें करना नादानी से अधिक मायने नहीं रखती। वास्तविकता तो यह है कि जिन अपनों के लिए वैध-अवैध का भेद मिटाकर धन का भण्डार एकत्रित करने में व्यक्ति जी-जान से जुटा रहता है, वही अपने उनसे बडे स्वार्थी बनकर मां, बाप, पति के रिश्ते भुलाकर सुख की चरम सीमा पर पहुंचकर विलासता को अंगीकार कर लेते हैं।
अनीति पूर्ण धनार्जन न तो वर्तमान में ही सुख देता है और न ही भविष्य को सुरक्षित बनाता है। पीढी-दर-पीढी चलने वाली परम्पराओं का हस्तांतरण होता रहता है। यही हस्तांतरण देश, काल और परिस्थितियों में नया स्वरूप ले लेता है।। इस नये कलेवर की प्रकृति व्यक्ति की सोच पर निर्भर होता है। सोच का उदय, वंशसूत्र और वातावरण के संयुक्त कारकों से होता है जिसे मनोवैज्ञानिक विश्लेषण से समझा जा सकता है। धनात्मक और ऋणात्मक पक्षों का चयन करके लोग अपने अभीष्ट की ओर भागने लगते हैं ताकि उन्हे लक्ष्य भेदन का सुख मिल सके। पर्दे के पीछे की मानसिक विकृतियां ही प्रकृति विरुद्ध कार्यों को जन्म देती है जिसे नियंत्रित किये बिना वास्तविक लक्ष्य तक पहुंचना सम्भव नहीं होता। 
आज के ‘रोजनामचा’ का विषय और लेखन दौनों ही लीक से हटकर हैं। इसके लिए क्षमा चाहता हूं। पत्रकारिता से जुडे कार्य हेतु आज रात को ही हमें बाहर जाना है। इस विवसता के कारण यह दैनिक कालम कुछ समय के लिए आप तक न पहुंचा पाने का दर्द हमें भी है और निश्चय ही आप भी कङीं न कहीं इसकी कमी जरूर महसूस करेंगे, ऐसा हमें विश्वास है। आपका पर्याप्त स्नेह ‘रोजनामचा’ को निरंतर मिलता रहा। इसके लिए हमेशा आभारी रहूंगा। फिलहाल हमारे बाहर जाने से जुडे लक्ष्य भेदन के लिए आप की आशीष प्रार्थनीय है। वापिस आकर आपके सम्मुख पुनः उपस्थित हो जाऊंगा। तब तक के लिए अनुमति दीजिये।

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