मैं,
दर्द समेटे सर्दियों से
एक बुत बना
खड़ा हुआ हूं।
मैंने-
देखा है हंसकर
बिताए गए व्यतीत को
और आज-
उन्हीं के उदास चेहरो को
देख रहा हूँ।
मैं शिला की मूर्ति
जिसे लोग
निर्जीव मात्र समझते हैं,
उन्हें मैं नासमझ मानता हूं।।
वे ही-
रास्तों में चलकर गिरते हैं
ठोकरें खाकर।
और मैं-
शिलाखण्ड सिर्फ
देखता हूँ उन्हें।।
यही नहीं-
उनके साथ-साथ
हरेक की कहानी
देख-सुन रहा हूं।
सबके कथानक एक जैसे है।।
मेरे जेहन में,
एक प्रश्न उठता है-
बताओ कहाँ गए वो दिन,
जब हर जगह
खुशनुमा नजारे ही
नजर आते थे?
और अब मैं-
इस दौर के
उन मासूम चेहरों पर
दहशत का साया
देख रहा हूं।
प्रतीत होता है-
सभी उस समय के
प्रेम-पुजारी
अब मेरी तरह
पत्थर की मूर्ति बन गए हैं।।
मै-
तन-मन,
दिल-मस्तिष्क लिए
एक बुत सा बना
खड़ा हूं
सुन रहा हूं-
वे चीखें ही ‘आहैं‘ जो
आज सबके
व्यक्तित्वों से निकल रही हैं।
दर्द समेटे सर्दियों से
एक बुत बना
खड़ा हुआ हूं।
मैंने-
देखा है हंसकर
बिताए गए व्यतीत को
और आज-
उन्हीं के उदास चेहरो को
देख रहा हूँ।
मैं शिला की मूर्ति
जिसे लोग
निर्जीव मात्र समझते हैं,
उन्हें मैं नासमझ मानता हूं।।
वे ही-
रास्तों में चलकर गिरते हैं
ठोकरें खाकर।
और मैं-
शिलाखण्ड सिर्फ
देखता हूँ उन्हें।।
यही नहीं-
उनके साथ-साथ
हरेक की कहानी
देख-सुन रहा हूं।
सबके कथानक एक जैसे है।।
मेरे जेहन में,
एक प्रश्न उठता है-
बताओ कहाँ गए वो दिन,
जब हर जगह
खुशनुमा नजारे ही
नजर आते थे?
और अब मैं-
इस दौर के
उन मासूम चेहरों पर
दहशत का साया
देख रहा हूं।
प्रतीत होता है-
सभी उस समय के
प्रेम-पुजारी
अब मेरी तरह
पत्थर की मूर्ति बन गए हैं।।
मै-
तन-मन,
दिल-मस्तिष्क लिए
एक बुत सा बना
खड़ा हूं
सुन रहा हूं-
वे चीखें ही ‘आहैं‘ जो
आज सबके
व्यक्तित्वों से निकल रही हैं।
-डॉ. भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी