रात को मैं
शहर की सुनसान सड़क से
गुजर रहा था।
मैंने देखा-
घण्टाघर के पास
जहाँ मूंगफली वाला
बैठा करता है,
वहीं एक कृशकाय लड़का
ठण्डक से बचने के लिए
एक चद्दर ओढ़े
सिमटा हुआ लेटा था।
उसे ठण्ड के कारण
नींद नहीं आ रही थी।
वह ठण्ड से
थरथर कांप रहा था।
विचारों के तानेबाने में उलझा
अपने घर की तरफ
जा रहा था।
मैं रूक गया था,
रात में चांदनी छिटकी हुई थी
तारे टिमटिमाते हुए
शरद ऋतु की रात में
आकाश पर छाये हुए थे।
मुझे चांदनी रात
सुखद लग रही थी- लेकिन
ठण्ड से ठिठुरते लड़के को देखकर
मुझे लगा था कि
यह भाग्य की बेइमानी है।
किसी को शीत ऋतु की
चांदनी अच्छी लगे
और कोई-
वही रात किसी तरह
काटने पर विवश हो।।।
-डॉ. भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी
9454908400
शहर की सुनसान सड़क से
गुजर रहा था।
मैंने देखा-
घण्टाघर के पास
जहाँ मूंगफली वाला
बैठा करता है,
वहीं एक कृशकाय लड़का
ठण्डक से बचने के लिए
एक चद्दर ओढ़े
सिमटा हुआ लेटा था।
उसे ठण्ड के कारण
नींद नहीं आ रही थी।
वह ठण्ड से
थरथर कांप रहा था।
विचारों के तानेबाने में उलझा
अपने घर की तरफ
जा रहा था।
मैं रूक गया था,
रात में चांदनी छिटकी हुई थी
तारे टिमटिमाते हुए
शरद ऋतु की रात में
आकाश पर छाये हुए थे।
मुझे चांदनी रात
सुखद लग रही थी- लेकिन
ठण्ड से ठिठुरते लड़के को देखकर
मुझे लगा था कि
यह भाग्य की बेइमानी है।
किसी को शीत ऋतु की
चांदनी अच्छी लगे
और कोई-
वही रात किसी तरह
काटने पर विवश हो।।।
-डॉ. भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी
9454908400