मुझे
एक भीड़ ने घेर रखा था
क्योंकि-
मैं अपने घर का रास्ता
भूल गया था
मैं
उस भीड़ में
अपने को असहाय
महसूस कर रहा था
मुझे
मात्र अकेलापन
भयाक्रान्त किए था
मैं
अपने एकाकीपन से
शीघ्र छुटकारा पाना चाहता था
इसलिए-
भीड़ पर दृष्टिपात
करता हुआ
अपने
किसी सहायक की खोज में
जुटा था।
मैं
अपनी पहचान बनाने के लिए
याचक भाव से
हरेक पर नजरें घुमाता था
पर भीड़ और
भीड़ के चेहरों में से
किसी ने मेरा साथ
नहीं दिया था
मैं-
अपनी कातर भाव-भंगिमा से
भीड़ को प्रभावित
करने का असफल प्रयास
करता था।
फिर भी भीड़ ने
मेरी आँखों की तरलता
की तरफ
ध्यान नहीं दिया था।
मैं अपने को
खोया-खोया सा महसूस
करने लगा था।
मैं सोचने लगा था कि-
आज हर कोई घर के रास्ते
भूले हुए मेरी तरह
अपनी-अपनी आँखों में
‘याचना’ भाव लिए
खड़ा है
अपने शहर की भीड़ में
अपनी पहचान
बनाने के लिए।
-डॉ. भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी
9454908400
एक भीड़ ने घेर रखा था
क्योंकि-
मैं अपने घर का रास्ता
भूल गया था
मैं
उस भीड़ में
अपने को असहाय
महसूस कर रहा था
मुझे
मात्र अकेलापन
भयाक्रान्त किए था
मैं
अपने एकाकीपन से
शीघ्र छुटकारा पाना चाहता था
इसलिए-
भीड़ पर दृष्टिपात
करता हुआ
अपने
किसी सहायक की खोज में
जुटा था।
मैं
अपनी पहचान बनाने के लिए
याचक भाव से
हरेक पर नजरें घुमाता था
पर भीड़ और
भीड़ के चेहरों में से
किसी ने मेरा साथ
नहीं दिया था
मैं-
अपनी कातर भाव-भंगिमा से
भीड़ को प्रभावित
करने का असफल प्रयास
करता था।
फिर भी भीड़ ने
मेरी आँखों की तरलता
की तरफ
ध्यान नहीं दिया था।
मैं अपने को
खोया-खोया सा महसूस
करने लगा था।
मैं सोचने लगा था कि-
आज हर कोई घर के रास्ते
भूले हुए मेरी तरह
अपनी-अपनी आँखों में
‘याचना’ भाव लिए
खड़ा है
अपने शहर की भीड़ में
अपनी पहचान
बनाने के लिए।
-डॉ. भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी
9454908400