जहरीली घुटन

दीवारों पर पोस्टर
और पोस्टरों में
व्याप्त भय हवा गर्म
और गर्म हवा में
एक जहरीली घुटन।।
कूंचे गली सड़कों पर
रात के सन्नाटे में
व्याप्त अंधकार
लगता है बन गया है
मानव भक्षी!!!
हमने-
अब अंधेरे में रहने की
आदत डाल ली है।
वर्तमान देखकर
किसी भी कार्य के लिए
कदम बढ़ाएंगे!!
रुकते हैं,
ठहरकर सोचते है-
जिसने भी कदम बढ़ाया है
वह कहीं पर
गुम हो गया है।
हमने वर्तमान परिवेश को
नित्य गालियाँ दी हैं।
हमें क्रोध आता है
लोगों पर-
जो हमारे रिश्तों में
दरार डालने के लिए
भव्य समारोहों में
फीते काटते है!!
हमें अहसास होता है
हमारे खून के रिश्ते
कट रहे हैं
और हम पाषाण
बन गए है!!!
यही नहीं-
हमें प्रतीत
होने लगा है कि-
लोगों के षडयंत्रो मेें भी
दोगलापन आ गया है।
और
सभी का पूर्ण आस्तित्व
भीड़ में कहीं
खो गया है।।
-डॉ. भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी

Post a Comment

Previous Post Next Post