विलुप्त हुई भीड़

मियाँ
ट्रेन का सफर
नींद का झोका
और-
स्वप्न देखता हूँ कि-
मैं बूढ़ा हो गया हूँ।
अपरिचित स्थान
एकाएक उठे हुए हाथों का
गिर जाना
किसी सकरे स्थान से होकर
गुजरने का आभास।
एक प्रश्न चिन्ह
अपने आप उभरा
और स्वयं से एक प्रश्न-
वे हाथ गुलदस्ते और
वह भीड़ का रेला
कहाँ गया?
क्या-
सबकुछ समाप्त?
मेरे चारों तरफ नीरवता
लगता है सीकचों में
कैद हो गया हूँ।।
घबराहट
पुनः सोचने पर विवश
मेरे परिचितों और स्नेहियों
की भीड़ कहाँ है?
उत्तर स्वयं मिल जाता है-
समय का फेरा
लोगों को हकीकत का ज्ञान
अब सबकी आँखें
खुल गई
और इसीलिए मैं अब
उनके लिए
निष्प्रयोज्य हो गया हूँ
एकाएक ट्रेन का रूकना
झटके में नींद का
खुल जाना
पता चला गंतव्य
आ गया-
और मै प्लेटफार्म पर
हाथ में एक झोला लिए
किंकर्तव्य विमूढ़ सा
उतर जाता हूँ।।।
-डॉ. भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी
9454908400

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