शर्मा जी के श्रवण कुमार : यह कैसी पितृभक्ति...?

 एक कलमकार की व्यथा-कथा

 

-डॉ. भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी/ सुपरिचित कलमकार शर्मा जी कहते हैं कि पत्नी पुत्र से अपेक्षा करती है कि उसका बेटा श्रवण कुमार बने परन्तु दूसरी तरफ पति को श्रवण कुमार बनते हुए देख नहीं सकती। यदि मैं श्रवण कुमार नहीं बन सका- तब पुत्र से कैसी अपेक्षा? लोगों, हित-मित्रों से दुःख बांटना और यह कहना कि मैं बड़ा अभागा हूँ, श्रवण कुमार जैसी सन्तान न मिलने का दुःख है बेमानी ही होगा। शर्मा जी की स्थिति कुछ इसी तरह की हो गई है। पुत्र सन्तान जब अपने बाप से यह कहे कि तुम मेरे टुकड़ों पर पल रहे हो तब क्या बीत सकती है एक बाप पर। ऐसी संतान से किस तरह की अपेक्षा करेगा वह। ऐसा ही दुःख झेल रहा है एक सुपरिचित कलमकार। ऐसे पिता को अभागा ही कहा जाएगा। उसको दो जून की रोटी देने के लिए पुत्र सन्तान का ‘बजट’ गड़बड़ा जाता है। पुत्र के बजट पर बोझ न पड़े इसकी चिन्ता पिता को होना लाजमी है।
पिता मनमसोसकर शेष जीवन काटने पर विवश हो या फिर गृह त्याग कर पुत्र के बजट का ध्यान रखे........क्या करे, क्या न करे? इसी असमंजस में कलमकार शर्मा जी डेढ़ दशक से पड़े हैं। उधेड़बुन........कोई परिणाम नहीं। क्या आप के पास कोई उपाय है? यदि हो तो अवश्य बताएँ। शर्मा जी के अन्दर का पिता अपने पुत्र की विवशता को बेहतर समझता है, उसकी अर्थव्यवस्था अव्यवस्थित न हो इसका ध्यान उन्हें हमेशा रहता है। शर्मा जी की पत्नी अपने पुत्र मोह के आगे नतमस्तक हैं। पुत्र कुछ भी कह डाले और कुछ भी कर डाले वह चुप्पी मारे रहती हैं। शायद वह उनके लिए श्रवण कुमार साबित हो रहा हो.....? शर्मा जी का दाम्पत्य जीवन कैसा हो सकता है आप ही अन्दाजा लगाएँ। पति-पत्नी के बीच में पुत्र ऐसा सेतु बन गया है जो दोनों को सर्वथा अलग कर रखा है। पुत्र रूपी सेतु के कारण शर्मा जी के दाम्पत्य जीवन की गाड़ी..........
खैर! छोड़िए-
क्या आप भी शर्मा जी की तरह हैं? श्रवण कुमार को जानते हैं? किंवदन्ती वाला श्रवण कुमार जिसने अपने अन्धे माता-पिता को काँवर में बिठाकर चारो धाम की यात्रा करवाया था। क्या आप की पुत्र सन्तान श्रवण जैसी मातृ-पितृ भक्त है.......? यदि आप में यह गुण होगा तो आपका पुत्र भी श्रवण कुमार जैसा ही होगा। शर्मा जी श्रवण कुमार नहीं बन सके थे इसलिए उनको यह दण्ड मिला और वह भी श्रवण कुमार जैसा पुत्र पाने से वंचित रह गए.....। अब पुत्र के क्रिया-कलापों से त्रस्त और पीड़ित तनावग्रस्त होकर अपनी व्यथा-कथा लोगों से साझा करते हैं। जिल्लत-जलालत भरी जिन्दगी जीते हुए शर्मा जी नेत्र-ज्योति होते हुए भी एक अंधे पिता का किरदार निभा रहे हैं इस उम्मीद के साथ कि शायद उनका पुत्र श्रवण कुमार बन ही जाए और............दो जून की रोटी देने में उसकी अर्थव्यवस्था चरमराने से बची रहे। उसका बजट ठीक-ठाक रहे। शर्मा जी पुत्र को शाप भी नहीं दे सकते........। उसका अहित सोचकर पाप के भागी नहीं होना चाहते। पिता हैं.......कष्ट सह लेंगे लेकिन संतान के प्रति उनका वात्सल्य कम नहीं होगा।
दूसरी तरफ उनका पुत्र-
‘एको अहम् द्वितीयो नास्ति’ को अपने जीवन का मूल मंत्र मानकर अहंकारी बना पितृ उपेक्षा के साथ लोभी बन बैठा है। क्या हो रहा है- क्या होगा.....? यह श्रवण कुमार तो आत्म प्रशंसक बना हुआ है- शर्मा जी के पुत्र के इर्द-गिर्द भी ऐसे लोगों की भीड़ है जो उसकी झूठी प्रशंसा ही करते हैं। यह बात दीगर है कि वह प्रशंसा का पात्र है या नहीं। शर्मा जी ने किसी से अपने श्रवण कुमार के रवैय्ये में बदलाव के बारे में परामर्श लिया था तब उन्हें बताया गया था कि समय आने पर सब ठीक हो जाएगा। शर्मा जी ने कहा था कि वह समय कब आएगा उनके मरने के बाद या फिर जीते जी वह अपने श्रवण कुमार को भला मानुष के रूप में देख लेंगे.....?
कुल मिलाकर शर्मा जी की स्थिति बड़ी ही दयनीय है। अंधी माँ और कलयुगी पुत्र एक साथ मिलकर घर की शासन सत्ता का संचालन कर रहे हैं। जिसके तहत उनकी हालत और भी दयनीय हो गई है। शर्मा जी कहते हैं काश! धन संचय किया होता तब यह दिन न देखना पड़ता। पुत्र को ही धन मान लिया- अब ताने उलाहने और कुतर्क सुनना विवशता है। उन्हें इसका मलाल नहीं कि उनके दो जून की रोटी की व्यवस्था में पुत्र का बजट गड़बड़ होता है दुःख इस बात का है कि उन्होंने उसे श्रवण कुमार के रूप में अब तक नहीं पाया। माँ-बेटा बजट बनाते हैं दोनों सक्षम हैं इसलिए शर्मा जी से कोई मशवरा नहीं करते हैं। शर्मा जी को इस बात का रंज भी नहीं। घर-परिवार में उनकी रोटी को लेकर किच-किच हो..........इसका भय उन्हें हमेशा रहता है। इसीलिए वह चुप्पी साधे घर की रसोई की तरफ नजर गड़ाए दो रोटी मिलने की प्रतीक्षा करते हैं। 

-डॉ. भूपेन्द्र सिंह गर्गवंशी

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