देश के विकास के लिए बहुमुखी प्रयासों का ढिंढोरा पीटा जा रहा है। राष्ट्रीय स्तर से लेकर ग्रामीण स्तर तक चलने वाली सरकारी योजनाओं, सरकार के द्वारा वित्त पोषित कार्यों, विदेश से सहायता प्राप्त कल्याणकारी कार्यक्रमों, गैर सरकारी उपायों सहित स्थाई विभागों की नियमित दायित्वों की पूर्ति के कागजी आंकडों पर ठहाके लगाने वाले धरातली स्थितियों को निरंतर नजरंदाज कर रहे हैं। निरीक्षण, परीक्षण और जांच के साथ-साथ निगरानी करने वालों को अपने अधिकारों के एवज में व्यक्तिगत हितों को परवान चढाने की चिन्ता रहती है जिसके लिए नये-नये उपाय आजमाये जाते हैं।
व्यवस्था को धता बताते हुए नियमों, अनुबंधों और शर्तों को तिलांजलि देने वाले अपनी पहुंच की दम पर निरंकुश मनमानियों को अंजाम तक पहुंचाने में जुटे हैं। शायद ही किसी नागरिक को देश में चलने वाली सभी लोकहितकारी गतिविधियों से लेकर सरकारी औपचारिकताओं तक की जानकारी हो। विकास के सोपानों की जानकारी के बिना प्रगति की अंधी दौड में निरंतर तेज होती जा रही है। आश्चर्य तो तब होता है जब जिला मुख्यालय से लेकर देश की राजधानी तक के विभागाध्यक्ष भी सभी जानकारियां से अनभिग्य रहते हैं। साइबर के अधिकतम उपयोग का दम भरने वाले अभी तक एक ऐसी बेव साइट लांच नहीं कर सके जिसमें देश के नागरिक को एक ही स्थान पर सारी जानकारियां मिल सके। अनेक साइट पर तो लम्बे समय से अपडेटिंग न होने की स्थिति बनी रहती है। कस्बों से लेकर महानगरों तक के गली-कूचों में सरकारी महके के ऐसे कार्यालयों के बोर्ड लटके नजर आते हैं जिनका नाम तक सुनने में नहीं आता। इन कार्यालयों में भारी अमले की कागजी तैनाती भी रहती है और उन्हें संचालित करने के लिए भारी धनराशि का अतिरिक्त आवंटन भी होता है परन्तु उनकी भौतिक उपस्थिति नगण्य से आगे कभी नहीं पहुंचती।
टीवी, रेडियो, अखबार और बेव साइड पर विज्ञापनों के माध्यम से प्रचारित की जाने वाली योजनाओं तक की पूरी जानकारी प्राप्त करना भी टेढी खीर सावित हो रही है। ऐसे में इक्कीस वीं सदी का भारत कागजी आंकडों की बाजीगरी में कीर्तिमान स्थापित तो कर सकता है परन्तु उसके लिए धरातल पर हो रही अभावग्रस्त, समस्याग्रस्त और शोषणग्रस्त लोगों की श्रंखलावद्ध मौतों को झुठलाना भी तो सहज नहीं है। भ्रष्टाचार के विश्वव्यापी वातावरण में लालच के हथियार से निजी मंसूबों को पूरा करने वालों को एक न एक दिन स्वयं से पूछे जाने वाले अतीत के कामों से सम्बन्धित प्रश्नों का उत्तर नहीं सूझेगा और तब ग्लानि की गलन में पीडादायक मृत्यु ही अन्तिम सत्य बनकर स्थापित होगी। फिलहाल इतना ही, नवप्रभात पर रेखाकिंत किये जाने योग्य एक नये मुद्दे के साथ फिर मिलेंगे। तब तक के लिए अनुमति दीजिये।
