अथ केतली-कुल्हड़िया महागठबंधन कथा



केतली-कुल्हड़िया आमने सामने। आपस में बतियाते। थोड़ी दूर स्टूल पर बैठा टी स्टाल मालिक कान में कलम खोंसे छोटी-सी कॉपी में हिसाब किताब में मशगूल था। ...‘धत तेरे जमाने की’-छुटकी कुल्हड़िया ने खखारते हुए गले में फंसे बलगम को थूकना चाहा पर बलगम था कि सदन के बिगड़ैल सांसदों की तरह बाहर न निकलने की जैसे जिद ठाने था। ढीठ कहीं का...बलगम गले में ही फंसा बैठा रहा। कुल्हड़िया ने अगल बगल देखा और फिर से दुहराया-क्या खराब जमाना आ गया। केतली ने टोंका-क्या हुआ छोटी बहना? कुल्हड़िया ने केतली को इग्नोर किया जैसे सुना ही न हो। केतली ने दुबारा पूंछा-बोलती नही, नाराज हो क्या? अरे नहीं री बड़ी दीऽऽ... नाराज होके भी तेरा क्या बिगाड़ लेंगे। कुल्हड़िया ने जवाब दिया-बड़की बूऽऽ, तेरा तो आजकल बढ़िया टैम चल रहा है। 
पीएम संग एक बार तेरा रिश्ता क्या जुड़ा तबसे भाव बढ़े हैं तेरे। जिसको देखो वही तेरे से नातेदारी जोड़ने को आतुर हैं। खासकर, भगवा दल के लोग तो तेरे साथ जुड़ना अपना स्टेटस समझने लगे हैं। जिसको देखो वही चायवाला, केतलीवाला खुद को साबित करने में लगा है। खासकर भगवा दल के मोहल्ला-जिलाछाप नेता तो खुद की चायवाली पहचान बनाने में जुट गए हैं। कभी सपने में भी चाय बेंच लिया तो समझो कल्याण हो गया। उस दिन घरैतिन ने अपनी नाक दबाते हुए झिड़का-छी किसी काम के नहीं, ताउम्र करते रहो अखबारी मगजमारी। कभी चाय बेंच लेते तो जिंदगी संवर जाती। मझली बेटी के बीच बचाव ने इज्जत का रामदल निकलने से बचा लिया। अब उधर की हाल। छोटकी कुल्हड़िया की बात में केतली को महागठबंधन सरीखी घटना की बू आने लगी। बमक गई-देखो, छुटकीभर हो, अपने कद के हिसाब से हद में रहने की आदत डाल लो। कुल्हड़िया-बस भी करो बड़ी बूऽ बूऽ, कहने को हम छोटेभर हैं इत्ते से, पर हमारा भी कभी समय था। बीते दिन याद कर केतली अचानक भावुक हो गई। गहरी सांस लेते बोली-इतनी जल्दी भूल गई। लालू यादव रेलमंत्री थे। हर रेलवे स्टेशनों में हमारी मौजूदगी कंपलसरी थी। सब समय-समय की बात है। कुल्हड़िया ने दुबारा गहरी सांस ली। सब दिन जात न एक समान।
तीन लोक से न्यारी काशी आकर बिहार के सुशासन बाबू ललकार गए कि संघ मुक्त भारत, नशा मुक्त समाज बनाकर दम लेंगे। अचानक कुल्हड़िया ने पैंतरा बदला-सुनो तो बड़ी दीऽ, अगर तीर वाले सुशासन बाबू, शीशे की लालटेन के मालिक आपस में महागठबंधन कर सकते हैं तो हम दोनों केतली-कुल्हड़िया गठबंधन करके नहीं रह सकते क्या? सुझाव हिट रहा। अंदरखाने की खबर है कि जिस्ते की केतली और मिट्टी की कुल्हड़िया अलग-अलग प्रजाति, पर दोनों में महागठबंधन होने जा रहा है। बर्खुरदार टी स्टाल मालिक को पता नहीं और उसी के दुकान में रहने वाली कुल्हड़िया-केतली पॉलिटिकल गेम की तैयारियों में जुट गए हैं। 
सार तत्व ---------लालू यादव की बैशाखी पर टिके नीतीश बाबू इधर यूपी में लालू के समधी मुलायम सिंह की राजनीतिक जड़ों में मट्ठा डालने का कार्य कैसे कर पाएंगे और जब लालू-नीतीश का महागठबंधन डिस्टर्ब होगा तब उनकी देखा देखी गठबंधन करने वाली केतली और नन्ही कुल्हड़िया का गठबंधन टूटना बिखरना तय है। 

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