जातिगत विभेद पाटने के सामाजिक प्रयासों पर राजनैतिक अवरोध

-रवीन्द्र अरजरिया/ देश में जातिगत खाई को पाटने के लिए चल रहे आम आवाम की कोशिशों को रोकने के लिए राजनैतिक प्रयास तेज होते रहे हैं। सिंहस्थ में दलितों के साथ स्नान, ध्यान और भोजन के महाआयोजन के लिए ढिंढोरा पीटने वालों को समाज ने आइना दिखाना शुरू कर दिया। अपेक्षा के विपरीत बयार चलते ही वक्तव्यों के शब्द और शैली दौनों ही बदलने लगे। एक दल विभेद समाप्त करने के नाम पर समाज को विभाजित करने वाली स्थितियों को रेखांकित करता है तो दूसरा उसकी आलोचना करके हवा देने का काम करता है। दौनों ही घटक अपने को हितैषी साबित करने के लिए अतीत की कार्य विभाजन पद्धति पर चलने वाली सामाजिक व्यवस्था को दलगत नीतियों के तहत वैमनुष्यता पैदा करने वाली मनगढन्त परिभाषायें प्रस्तुत करने लगते हैं। वोट बैंक बढाने के लिए समाज में कडुवाहट घोलने वाले राष्ट्रीय एकता की कीमत पर भी पार्टी को मजबूत करने के लिए प्रयास हो रहे हैं जिन्हें कदापि स्वीकार नहीं किया जाना चाहिये। कद्दावर नेताओं के द्वारा पर्दे के पीछे से बोली जाने वाली स्क्रिप्ट को मंच पर उच्चारित करने वाले जमीनी कार्यकर्ता ही आखिरकार वलि का बकरा बनते हैं। जातिगत असमानता के बीजों को मानसिक द्वेष की खाद से पोषण देने वाले, समाज को झगडों से लेकर हमलों तक की सौगात देकर सहानुभूति के हंसिये से मनमानी फसल काट कर माला माल होने की नीतियों पर काम कर रहे हैं। वास्तविकता तो यह है कि पंडित शू स्टोर से लेकर अहिरवार भोजनालय तक, दुआ अगरबत्ती से लेकर कृष्णा लोभान तक और मजारों पर हिन्दूओं द्वारा बांधे गये मन्नतों के धागों से लेकर मंदिर समितियों में मुसलमानों की सक्रिय भागीदारी देखने को सहज ही मिल जाती है। फिर कहां बची जाति की रूढवादिता और कहां ठहरा जन्म के आधार पर कार्य विभाजन। यह सब स्थितियां तो पुरानी किवदन्तियों को तोड-मरोड कर प्रस्तुत करके निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए पैदा की जाती हैं। ऐसे में हम सब को मिलकर जातिगत विभेद मिटाने वाले सामाजिक प्रयासों पर लगने वाले राजनैतिक अवरोध हटाने होंगे तभी राष्ट्रीय एकता, भाईचारे और सामाजिक समरसता के मूल्यों की पुनर्स्थापना हो सकेगी। फिलहाल इतना ही, नवप्रभात पर रेखाकिंत किये जाने योग्य एक नये मुद्दे के साथ फिर मिलेंगे। तब तक के लिए अनुमति दीजिये। 
-रवीन्द्र अरजरिया

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