निठल्ले की डायरी : शिवाशंकर पांडेय

विधान भवन और कबूतर-कबूतरी की गुटर-गूं   

सवाल एक बार फिर से मुंह बाए सामने खड़ा जवाब की प्रतीक्षा में। और, जवाब है कि अगल-बगल झांकते मुंह छिपाए हुए ठौर तलाश रहा है। निखट्टू कहीं का, मुंहचोर...। कबीर की उलटबांसी। जवाब पर सवाल भारी। गोया, अखिलेश बाबा के ‘काम बोलता है’ की गर्वोक्ति वाले सियासी बयान के सामने सीना ताने खड़ा गायत्री प्रजापति का कुकर्म। सत्ता के चीरहरण वाले सियासी छिछोरे...।
 योगी-राज सामने है। नजाकत, नफासत वाला लखनऊ एक संत की सत्ता-कुशलता का साक्षी बनने की ओर अग्रसर है। विधान भवन में चहल कदमी तेज हुई है। सरकारी अमला बदलाव के तेज दौर में है। विधान भवन के सामने बरगद की फुनगी पर बैठी कबूतरी ने जोरदार जमुहाई ली, पंख फड़फड़ाए तो उनींदे अलसाए पड़े कबूतर ने आंख की पुतलियों को तनिक सिकोड़ा, फिर सरकारी भाषा में डपटा। गोया किसी दफ्तरी को साहेब डपटता है -क्या बात है, आराम में खलल काहे कर रही हो? चहकते-मटकते कबूतरी ने जवाब दिया-उठो, सुबह हो गयी लल्लू...। लहजे में थोड़ा नरमी थी और प्रेम रस की फुहार भी।
  ये तो रोजाना होती है, सुबह का सूरज आज पहली बार थोड़े न निकला है? आदतन, कबूतर ने रोज की तरह कबूतरी पर दबाव बनाने की नाकाम कोशिश की। कबूतर की दबाव वाली कोशिश को इग्नोर करती कबूतरी ने जोरदार आंख मार ‘लव-इमोशन’ पैदा करना चाहा, पर कबूतरी की ये कोशिश वैसे ही औंधेमुंह धड़ाम हो गयी, जैसे विधानसभा चुनाव के वक्त हरदोई वाली जनसभा में मायावती का ये वाला भाषण कि ‘मुसलमानों के लिए शादी नहीं की।’ भगवान झूठ न बोलवाए...। एकदम सच्ची-मुच्ची।
  लखनऊ में नया सबेरा होने का अहसास होने लगा है। आज भोर का उगने वाला सूरज कुछ ज्यादा ही लालिमा लिए हुए निकला, जिसमें उम्मीदों की किरणें कुछ ज्यादा ही दमक रहीं थी। सच्ची जानो, ये उम्मीदें आवाम की हैं। फिलहाल, योगी आदित्यनाथ के शासन की शुरूआत आमजन के बीच सराही जा रही है। एंटी रोमियो स्क्वॉड ने भारतीय ललनाओं में भरोसा मजबूत किया है। विधायक-मंत्रियों से लेकर अफसर-कर्मचारी तक पंद्रह दिनों में संपत्तियों के मांगे गए ब्यौरे ने भी भरोसा मजबूत किया है। लगता है योगी राज जनमानस के बीच गहरी छाप छोड़ेगा। योगी राज के सुशासन पर आमजन को भी सहयोगी बनना पड़ेगा। 
 उधर, अकड़ती फड़कती अफसरशाही अब नौकरशाही में बदलती दिखने लगी है। विनम्रता की दरिया का बहाव सरकारी अमले में बहने लगा है। सरकारी दफ्तरों में फाइलों की धूल-गर्द झाड़ी जा रही हैं। परसों सुबह ही सुबह घरैतिन ने समझाइस दी-कानून में पोटा और शासन में निठल्लों के लिए संत का सोटा काफी है... सौ बीमारियों की बेहतर दवाई, बेलगाम नौकरशाही पर मजबूत और कड़क सवार। सज्जनों के लिए संत का प्रेम तो कुशल शासन के लिए सोंटा दोनों ही जरूरी। जोरदार ठहाकों से गूंजता है आमार-सोनार बांगला... बेटा-बेटी के जोरदार ठहाके।
 तबियत सुधरने का दौर है। सीएम बनते-बनते केशव डिप्टी सीएम बन गए। नेता नहीं, बेटा चुनो का नारा देकर फूलपुर में कमल खिलाने वाले केशव की राह निहारते यहां की जनता थक चुकी है। ढाई साल इंतजारी के बाद अंखियां दरस को तरस गईं। इस केशव के पास तो कोई उधौ भी नहीं दिखता। उधौ! मन न भए दस बीस...। उधर, पार्श्व से रेडियो में संगीत के साथ गीत बज रहा है- अंखियां थक गयी पंथ निहार, आ जा रेऽऽऽ ओऽऽ परदेशीऽऽऽ...।
 कसम भुवर के गुड़ही जलेबी की। हुकूमत बदली तो थाना, ब्लाक, तहसील के माहौल बदले-बदले नजर आने लगे हैं। सरकारी दफ्तरों के घाघ अफसर-कर्मचारी से लेकर गली-मोहल्ले के गुंडे-मवाली तक सत्ता के नजदीकी बनने की जुगत तलाश रहे हैं। कल तक के ‘समाजवादी’ दरोगा, बीडीओ, तहसीलदार, पुलिसिया छाया में पलते माफिया-डॉन अब जन्मजात भाजपाई बनने की जुगत में हैं। कुछ पुर्जे हर खांचा में फिट हो जाते हैं। चित्त भी, पट्ट भी, हर हाल में अंटी इनके बाप की ही रहती है। चाटुकारों की बमबम। 
बाटी चोखा के दौर में दलाल-लबार आगे-आगे। अखबारों में फोटू समेत खबर के लिए इलाकाई रिपोर्टर को साधना कोई आसान है क्या? सियासत के खोटे सिक्कों की भरमार ने भाजपा के खांटी कार्यकर्ताओं को कोसों पीछे ढकेलने लगे हैं। धोबी से उधारी में धुला झक्कास कुर्ता-पैजामा। ‘धुलाई दरोगाजी से ले लेना बे’- वाली घुड़की से सहमा लांड्री वाला सुशासन की राह ताक रहा है। सबका साथ, सबका विकास का नारा एक कोने में औंधेमुंह धड़ाम पड़ा कराह रहा है। विधान भवन के सामने बरगद की फुनगी में बैठे खुशहाल दिखने वाले कबूतर-कबूतरी कब के उड़ चुके हैं, नए ठौर की तलाश में। 
गौर फरमाएं, ग्रेटर नोएडा से ओमप्रकाश ‘यती’ की कविता की कुछ  पंक्तियों पर-
हम भी खुश थे जब वे जीते, लेना एक न देना दो
भाग रहे थे तुम भी पीछे, लेना एक न देना दो
जब लाखों की भीड़ जुट गयी, होड़ लगी फिर नारों की
मंगरू और जुम्मन भी चीखे, लेना एक न देना दो
क्यों देते हो राय सभी को, पूछ रहा है कोई?
बोले मुझसे मेरे बेटे, लेना एक न देना दो

-शिवा शंकर पांडेय (वरिष्ठ पत्रकार, स्तंभकार), मोबाइल- 9565694757 

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