मुँह से हाँथ के बीच की दूरी पर संघर्ष और बुलेट प्रूफ ट्रेन?

आज के युग में हम बुलेट प्रूफ़ ट्रेन चलाने का प्रयास कर रहे हैं जो काफी तीव्रता से फर्राटा भरेगी उसकी गति विद्युत के समान तीव्र होगी। आश्चर्य जनक बात यह है कि वह समुद्र की सतह के नीचे गतिमान होगी जिसका प्रथम मार्ग भारत की धरती पर मुम्बई से अहमदाबाद के मध्य निर्धारित किया गया। जिसका तकनीकी परिक्षण कार्य समुद्र की गहराइयों के नीचे आरम्भ हो गया। मिट्टी और चट्टानों का परिक्षण भू तकनीकि एवं भौतिकीय तकनीकि विभाग के द्वारा आरम्भ कर दिया गया।
प्रंतु एक सच जो सत्य है और सत्य होने के कारण अत्यधिक कड़ुआ है। भारत  की एक बड़ी आबादी हाँथ से मुँह के मध्य की दूरी पर संघर्षरत है। जीवन की मूल भूत सुविधाओं से वंचित है दो टाइम की रोटी के लिए संघर्ष कर रही है। तथा दूसरी तरफ़ दृश्य, आधुनिक युग और बुलेट प्रूफ ट्रेन की तैयारी में व्यस्त। बड़ा गम्भीर विषय है। किसान आत्महत्याएँ करने पर मजबूर हो रहा है। कर्ज की अधिकता हो जाने के कारण भूमि को बेचने पर मजबूर हो जाता है। और फाँसी के फंदे को गले लगा लेता है। अपने प्राण को त्याग देता है । अपने पीछे अपने भूखे परिवार को छोड़ जाता है।
मजदूर मजदूरी करने हेतु सापरिवार अपने ग्राम को त्याग कर शहर की ओर पलायन कर देता है । यह किस लिए अपनी जन्म भूमि को त्यागता है। मात्र दो जून की रोटी के लिए। शहर में आ जाने के पश्चात शहर की बढ़ी हुई मंहगाई का सामना मजदूरी करके करने का प्रायास करता है। प्रन्तु माकान का किराया और पेट की आग दो बोझ एक साथ हो जाते हैं जिनका सामना कर पाना अत्यन्त मुश्किल होने लगता है। प्रंतु गरीब मजदूर हिम्मत करके संघर्ष करने का प्रयास करता है और संघर्ष करता रहता है। लेकिन दो जून की रोटी एवं मकान के किराए का बोझ उठाने के लिए अतिरिक्त कार्य करने पर विवश हो जाता है। और अतिरिक्त कार्य (ओवर टाईम) करना आरम्भ कर देता है।
शरीर को स्वाभाविक आराम न मिल पाना एवं कार्य की प्रतिदिन की अधिक्ता के कारण शरीर बीमारियों से ग्रसित होने लगता है । और गम्भीर बीमारियों कि चपेट में आ जाता है । गम्भीर बीमरियों से ग्रसित हो जाने के कारण खाट पकड़ लेता है । और कार्य करने में अस्मर्थ होने के कारण शहर में कर्ज के बोझ से दबता चला जाता है।
अन्ततोगत्वा उसका परिवार पुन: ग्राम की ओर आने के लिए बाध्य एवं मजबूर हो जाता है । क्योंकि शहर में रहपाना अत्यंत मुश्किल हो चुका है । प्रंतु ग्राम की स्थित भी दयनीय है । क्योंकि जो थोड़ी भूमि भी थी वह कर्ज के कारण पहले ही बेचना पड़ी थीं । अब कल्पना कीजिए कि इस परिस्थित में गरीब व्यक्ति के पास अब क्या विकल्प बचा है। उसके परिवार में बूढ़े माता पिता एवं पत्नी तथा छोटे छोटे बच्चे हैं दो जून की रोटी की व्यवस्था कर पाना अब किसी बड़े युद्ध से कम नहीं है। 
चिकित्सा एवं उपचार की व्यवस्था कैसे होगी और कहाँ से होगी इसे कौन करेगा। जब दो जून की रोटी कि व्यवस्था करने के लिए ग्राम से शहर तक की यात्रा करनी पड़ी खर्च का बोझ अधिक होने के कारण अधिक समय तक कार्य करना पड़ा। जो कि आज स्थिति यहाँ तक पहुँच गई कि जीवन एवं मृत्यु के बीच संघर्ष आरम्भ हो गया। और परिस्थित अत्यन्त दुर्लभ हो गई।
आज भारत देश की बड़ी आबादी गरीबी के दुश्चक्र में फँसी हुई है। इस गम्भीर समस्या का समाधान होना चाहिए अथवा नहीं। यदि होना चाहिए तो कैसे होगा और कौन करेगा एवं अब तक क्यों नहीं हो पाया । सबसे गम्भीर प्रश्न यह है कि आज़ादी से लेकर आज तक की सभी राजनीतिक पार्टियों का चुनावी ध्रुवीकरण का आधार। गरीब, कमज़ोर, असहाय, एवं दुर्बल ही था । इनको केंद्र में रखकर वोट लेने की सदैव राजनीति की गई प्रंतु विजय प्राप्त करके सत्ता के सिंहासन पर आसीन होने के बाद किसी ने इस वास्तविक्ता पर अपना सम्पूर्ण रूप से ध्यान देना शायद उचित नहीं समझा इसीलिए आज यह स्थित अत्यंत गम्भीर रूप धारण कर चुकी है।
मात्र कागज पर छोटी लाईन को और बड़ी कर देने से सुधार एवं परिवर्तन तथा विकास का दृश्य दिखाई देगा ? अब तक की कार्य शैली एवं स्थित तथा परिस्थित को देख कर तो असंभव लगता है । आज़ादी को इतने वर्ष हो गए परिस्थित में सुधार न होकर अपितु दयनीयता का प्रकोप अधिक बढ़ा है । इसकी सुध कौन लेगा । यह गम्भीर समस्या एवं परिस्थित समस्त भारत देश में कमोबेस हर जगह पर अपने पैर पसार चुकी है । प्रत्येक गरीब चाहे शहरी क्षेत्र का हो अथवा ग्रामीण क्षेत्र का।
दो जून की रोटी के लिए संघर्ष कर रहा है यह हाँथ से मुँह के बीच की दूरी देखने में तो बहुत ही छोटी है प्रंतु सत्यता इसके ठीक विपरीत है । इतना विपरीत है कि इसका आंकलन करके इसे शब्दों में उतार पाना मुश्किल ही नहीं अपितु असम्भव है । यह दूरी देखने में नाम मात्र की है प्रंतु यह हाँथ से मुँह की दूरी इतनी अधिक है कि गगन एवं पृथ्वी के बीच की दूरी भी इस दूरी के सामने अल्प हो जाती है। धरातल पर यही स्थित है इसका कौन जिम्मेदार है। इतना बड़ा अंतर कैसे आया और कैसे हुआ। और दिन प्रतिदिन यह अंतर और बढ़ता ही चला जा रहा है।   

-एम०एच० बाबू 

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