अम्बेडकरनगर: कचरे में भविष्य तलाशता बचपन, बाल श्रम विभाग बेमानी

                
         सामाजिक संगठन, प्रशासनिक अधिकारी नहीं देते  ध्यान

अम्बेडकरनगर।
सरकार ने बच्चों को अनिवार्य रूप से शिक्षा दिलवाने के लिए वर्ष 2005 में अनिर्वाय शिक्षा अधिनियम लागू किया था, लेकिन 11 वर्ष बीत जाने के बाद भी  शिक्षा विभाग भारत सरकार के इस अधिनियम को अमल में नहीं ला पाया है। नगर के कई नन्हें-मुन्हें बच्चों की टोलियां सुबह के समय बस्ते पकडऩे की बजाय फटी हुई थैलियां थाम लेते है। प्रदेश के मुख्यमंत्री ने शिक्षित प्रदेश-स्वर्णिम प्रदेश का नारा देकर स्कूल चले हम अभियान की शुरूआत की थी तथा शासकीय अधिकारी-कर्मचारियों के साथ ही नागरिकों को भी स्वैछिक रूप से प्रेरक के रूप में नियुक्त कर शाला त्यागी एवं अप्रेशित बालक-बालिकाओं को स्कूलों में प्रवेशित करवाकर उन्हें शासन की योजनाओं का लाभ दिलवाने का संकल्प दिलवाया था ।

ये बच्चे नगर के प्रमुख चौक-चौराहों की होटलों पर काम करने के साथ ही नगर के शासकीय कार्यालयों व अधिकारियों के बंगलों के आसपास के भी भंगार बिनने का काम करते है, लेकिन इन बच्चों की दुर्रदशा देखने के बाद भी जवाबदार अधिकारियों का दिल नही पसीजता है, अधिकारी सारा नजारा देखने के बावजूद किसी को निर्देशित करने व बच्चों को समझाईश देना तक उचित नहीं समझते है।

कुछ रुपए के लिए 10 से 12 घंटे तक जी-तोड़ मेहनत करते है, दुकानों पर आने वाले शिक्षित ग्राहक भी ऐसे बच्चों को समझाईश देना तो ठीक समान भी नहीं दे पाते है, कोई भी इन्हें नाम से नहीं बुलाता है और आवश्कता पडऩे पर छोटू, ऐय-ओय के नाम से संबोधित करते है।

रिपोर्टः- सत्यम सिंह

Post a Comment

Previous Post Next Post