अम्बेडकरनगर
जिले में खाद्य विपणन (फूड मार्केटिंग) से जुड़े अनेकों निरीक्षक एवं अन्य तहसील व ब्लाक
स्तर के अधिकारी व कर्मचारी (विशेष तौर पर लिपिक) लूटखसोट एवं अपने मनमाने रवैय्ये
से चर्चा का विषय बने हुए हैं। इनके बारे में नित्य यह सुनने को मिल रहा है कि ये लोग
सुरा-सुन्दरी और नकद के एवज में गरीबों का निवाला खाद्यान्न कालाबाजारियों को सौंप
रहे हैं। चर्चा है कि कई प्रभावशाली बिचौलिये जैसे राइस मिलर्स, ट्रान्सपोर्टर्स, राजनैतिक
पार्टियों से कथित रूप से निकटवर्ती सम्बन्ध रखने वाले लोग और ब्राण्डेड मीडिया से
सम्बद्ध लोग इन निरीक्षकों/विभागीय कर्मियों के हम निवाला बने हुए हैं।
अनेकों बार
खबरें पढ़ने-सुनने को मिली हैं कि इन बगुला भक्तों पर महिलाओं ने दुष्कर्म का आरोप भी
लगाया है, इसकी जद में आने वाले कई विपणन निरीक्षक विभागीय स्तर पर दण्डित भी किए जा
चुके हैं, साथ ही गैर जनपद उनका स्थानान्तरण भी हो चुका है। आरोप है कि खाद्य विपणन
महकमे के ये अधिकारी/कर्मचारी दायित्वहीन से होकर रह गये हैं। ये मात्र अपनी जेबें
भरने व शारीरिक, भौतिक संतुष्टि के प्रयास में ही लालायित रहते हैं। समय-समय पर विभाग
द्वारा सरकारी समर्थन मूल्य पर की जाने वाली खाद्यान्न की खरीद से इनका कोई सरोकार
नहीं होता है। यदि इसमें कोई कमी आती है तो उसका ठीकरा जिला स्तरीय अधिकारी के सिर
फोड़ा जाता है। निरीक्षक, लिपिक एवं अन्य कर्मचारी अपना पल्ला झाड़ कर पाक दामन बन जाते
हैं।
सूत्रों के
अनुसार अम्बेडकरनगर जिले में तैनात कई शौकीन मिजाज, सुरा-सुन्दरी भोगी मार्केटिंग इंस्पेक्टर्स
व अन्य कर्मचारी प्रायः बाह्य रमणीक स्थानों पर मौज-मस्ती के लिए भ्रमण करते रहते हैं।
शानदार जिन्दगी जीने के आदी ये लोग कोटेदारों व सामान्य लोगों से सीधे मुँह बात ही
नहीं करते। बताया जाता है कि इनके कार्यालयों और खाद्य रसद गोदामों पर तैनात कर्मी
भी ऐशो-आराम की जिन्दगी जीने के आदी बन चुके हैं। इन लोगों का प्रतिदिन का निजी मौज-मस्ती
खर्च हजारों रूपये बताया जाता है। अपने कृत्य व स्वैच्छाचार पर पर्दा डालने के लिए
इन लोगों ने स्थानीय प्रशासन के कार्यालयों में तैनात स्वजातीय व खाने-पीने के शौकीन
कर्मचारियों को अपना दोस्त बना रखा है।
गोदामों पर तैनात लिपिक संवर्ग व अन्य श्रेणी
के कर्मचारी स्थानीय हैं, जिनका सम्बन्ध दबंग, हैंकड़, राजनैतिक पार्टियों के प्रभावशाली
स्वजातीय लोगों व अराजकतत्वों से बताया जाता है। इन खाद्य गोदामों का पर्यवेक्षण करने
का जिम्मा खाद्य विपणन निरीक्षकों को दिया जाना बेमानी सा होकर रह गया है, क्योंकि
गोदामों पर ये निरीक्षक कभी मिलते ही नहीं। वहाँ उपस्थित रहकर कोटेदारों से बात करना,
उनकी समस्याएँ सुनकर निराकरण करना और खाद्यान्न बोरियों का लेखा-जोखा रखना इनके लिए
तौहीन की बात है। ये निरीक्षक राइस मिलर्स और खाद्यान्न तस्करों से ही अपना मधुर सम्बन्ध
रखते हैं। क्रमशः..............
